Sunday, September 5, 2010

तुम्हीं से प्यार करता था, तुम्हीं को प्यार करता हूं।


तन्हा हो के भी मैं कभी तन्हा नहीं होता,
लम्हा कौन सा ऐसा के मेरा दिल नहीं रोता॥

तुम्हारी याद आती है औ पलकें भीग जाती हैं,
रहूं महफिल या वीरां में उदासी छा ही जाती है॥

कहूं किससे मैं हाले दिल, यहां अपना नहीं कोई,
जिसे अपना समझता हूं वो मुझको छोड़ जाते हैं॥

ये जालिम इश्क है कैसा, सबब इसका यही होता,
जिसे हम प्यार करते हैं, वो हमको भूल जाता है॥

तमन्ना है यही दिल में के जब होऊं मैं कफन ओढ़े,
जनाजे में वो आ कर के, दामन को भिगो जाये॥

निशानी कुछ नही मेरी, कहानी कुछ नहीं मेरी,
सिले हैं होठ भी मैंने, निगाहें बन्द करता हूं॥

जनाजे पे चली आना, यही फरियाद करता हूं।
नहीं खवाहिश बची कुछ भी, तुम्हीं को याद करता हूं।
तुम्हीं से प्यार करता था, तुम्हीं को प्यार करता हूं।


चित्र  dreamformypeople.blogspot.com से साभार।

1 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

तन्हा हो के भी मैं कभी तन्हा नहीं होता,
लम्हा कौन सा ऐसा के मेरा दिल नहीं रोता ॥

बहुत ही भावपूर्ण रचना ....