Saturday, March 28, 2009

क्या युवाओं को व्यायाम की आवश्यकता नहीं......

अभी मैं एक प्रतिष्ठित टी०वी० चैनल पर योगाभ्यास का कार्यक्रम देख रहा था। उस योगाभ्यास कार्यक्रम में अनेकानेक वरिष्ठ नागरिक लाभान्वित हो रहे थे। मुझे यह देखकर काफी निराशा भी हुई और आश्चर्य भी कि उस कार्यक्रम में एक भी युवा योगाभ्यास नहीं कर रहा था। यह स्थिति केवल उस टी०वी० चैनल की ही नहीं है वरन हमारे चारो ओर देखने को मिल जाता है। जब मैं सुबह टहलने के लिए निकलता हूं तो टहलने वालों में सबसे अधिक संख्या उनकी होती है जो अभी हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं और जैसे-जैसे हम कम उम्र के लोगों की ओर बढ़ते जाते हैं संख्या आश्चर्यजनक रूप से कम होती जाती है। स्थिति यह है कि १८-२० वर्ष आयु के युवा बहुत ढूढने के बाद कहीं दिख जाते हैं।
यह स्थिति अत्यन्त निराशाजनक है। कहा जाता है कि उपचार से बेहतर परहेज है। व्यायाम के महत्व को युवा संन्यासी स्वामी विवेकानन्द जी ने स्वीकार करते हुए कहा था कि युवाओं को खूब व्यायाम करना चाहिए क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क रहता है। बिना स्वस्थ मस्तिष्क के कोई भी कार्य नहीं किया जा सकता। फिर हमारे युवा के मन में यह छोटी सी बात क्यों नहीं आ रही है। अरे भाई क्या बतायें समय ही नहीं मिलता। समय नहीं मिलता या हम समय नहीं निकालते या साफ-साफ कहें तो समय का प्रबन्धन ठीक ढंग से नहीं कर पाते। एक प्रश्न और हमेशा मन में गूंजता है कि पहले का युवा कितना अलमस्त रहता था वह हर चीज में बढ-चढ कर हिस्सा लेता था और हर क्षेत्र में उसकी उपलब्धि देखी जा सकती है। पह पढ़ाई भी करता था और अच्छा खिलाड़ी हुआ करता था और यदि बात देशभक्ति की आ जाये तो जान देने को भी तैयार रहता था। ये सारे गुण आज के युवा में कम होते हुए से प्रतीत हो रहे हैं। हमारा आज का युवा व्यस्त अधिक हो गया है लेकिन आउटपुट कुछ देखने को नहीं मिल रहा है। यह तो वही बात हुई कि "बिजी विदाउट बिजिनेस"। इस स्थिति से हमारा युवा भी काफी निराश, हताश और परेशान है। उसे कोई राह दिखाई नहीं दे रही है, वह क्या करे, कहां जाये...... कोई है जो उसे सही राह दिखा सके.......... चिट्ठाजगत से गुहार है कोई उसकी मदद करे

Thursday, March 19, 2009

मां की डांट से क्षुब्ध बालक ने जान दी



इस तरह की ना जाने कितनी ही खबरें हम आये दिन समाचार पत्रों में पढ़ते रहते हैं। पहले इस तरह की घटनाएं कम होती थी और आज ज्यादा हो रही है ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। ऐसा भी हो सकता है कि पहले इन घटनाओ की जानकारी का क्षेत्र इतना व्यापक न था जितना आज का है। इस हेतु मीडिया के योगदान को नकारा नहीं जा सकता।
मां की डांट क्या इतनी कड़वी हो सकती है कि बालक जान देने पर उतारू हो जाय? पहले मुझे ऐसे पाल्यों पर तरस आता था जो ऐसी हरकत करके ईश्वर का खूबसूरत उपहार जीवन को ठुकराते थे। लेकिन कभी-कभी जीवन में ऐसी परिस्थितियां भी उत्पन्न हो सकती है जबकि हमारा दिमाग काम करना बन्द कर दे और हम गलत कदम उठाने पर मजबूर हो जायें। अक्सर ऐसा होता है कि हम अपने अपनों से आवश्यकता से अधिक की अपेक्षा रखते हैं। यह स्थिति पालक और पाल्य दोनों के साथ होती है। जब मेरी मां ने मुझे खरी-खोटी सुनाई तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे मेरा इस संसार में अब कोई रहा ही नहीं। जब अपनी मां जिसने मुझे जन्म दिया वह ऐसी बातें कह रही है तो ठीक है मैं उससे बहुत दूर चला जाउंगा। शायद वह अकेले ही रहना चाहती हैं तो ले-लें अपना राज-पाट, मुझे नहीं रहना है इनके साथ। दूसरे के मां-बाप अपने बच्चों के लिए क्या-क्या नहीं करते। मैंने कभी कोई नाजायज मांग भी नहीं की। फिर भी मुझे सबके सामने जलील करने का प्रयास किया जा रहा है। शायद मेरी मां मुझसे उब गयी है। यदि यही सच है तो मैं खुद ही उससे दूर चला जाता हूं जिससे कि वह खुश रहे........
इस तरह के न जाने कितने ही विचार एक ही सेकेण्ड के अन्दर मन में आ जाते हैं और दिमाग के सर्वर को डाउन करने पर तुल जाते है, यदि इस समय आपका सर्वर डाउन हो गया यानि की विचार चेतना ने साथ छोड़ दिया तो घर से बहुत-बहुत दूर जाने का विचार मन में आता है और लोग गलत कदम उठाते हैं।
किंतु यदि इसी बात को मां के पक्ष से सोचा जाय तो ..... तो क्या हम इस तरह का निर्णय (घर@दुनिया छोडने का निर्णय) लेते समय उस मां के दर्द का अनुमान लगा पाते हैं, जो कि अपने बच्चे के जन्म के लिए कितने दुख झेलती है, कहा जाता है कि जब एक बच्चा जन्म लेता है तो मां का दूसरा जन्म होता है, जिस मां ने अपने बच्चे को एक-एक पल अपनी आंखों के सामने बढ़ते हुए देखा है यदि बुढ़ापे में उसका बच्चा उससे छीन लिया जाय, या बच्चा उसे छोड़कर चला जाय तो उस मां की स्थिति क्या होती होगी इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता, उसके लिए उस समय तो यही स्थिति होती है कि उसका सर्वस्व लुट गया।
उसका सर्वस्व लुटे तो लुटे मुझे क्या। मुझे तो सारे समाज के सामने उसी ने जलील किया और घर छोड़ने पर मजबूर किया। जब घर छुड़ाया है तो संतानहीन होने का सुख भोगे घर में अकेले रहे।
एक संतानहीन औरत के लिए संतान का न होना सहा जा सकता है किन्तु सन्तान के होते हुए संतान का बिछोह किसी मां के लिए सहनीय नहीं है। वह जीते-जी मर जाती है। लेकिन प्रकृति ने उसे शक्ति दी है जिसके बलबूते पर वह सबकुछ शान्त होकर सारे आरोप प्रत्यारोप अपने उपर लेते हुए चुपचाप सबकुछ सह जाती है।
मां ने बुरा भला कहा, पर क्यों? क्योंकि वह आपसे प्यार नहीं करती। बिल्कुल गलत। वह आपको बहुत चाहती है। अगर आपको कोई तकलीफ होती है तो पहले दर्द मां हो होता है। फिर उसने बुरा भला क्यों कहा? उसने केवल आपकी भलाई के लिए ही अपने कलेजे पर पत्थर रखकर आपको भला-बुरा कहा। मेरी भलाई के लिए, भला वह कैसे? कोई भी मां अपने बच्चे से अलग नहीं रह सकती। लेकिन जब मां देखती है कि घर, परिवार एवं समाज की परिस्थितियां कितनी बदलती जा रही है, ऐसे में यदि आप मां के आंचल (आश्रय) में ही रह गये और खुद अपने आप अपने बारे में विचार करना शुरू न किया तो आने वाले समय में आपको कौन सम्भालेगा (मां के न रहने पर)। वह केवल आपकी खुशी के लिए आपसे दिखावा करती है कि वह आपको नहीं चाहती, वह आपसे खिन्न है, किन्तु उसकी उस समय स्थिति क्या होती है यह एक मां ही समझ सकती है।
मां की डांट में छिपी उसकी भावना की कद्र करना हर संतान का कर्तव्य है। अपनी मां के दुख को समझिये और उसे जीवन भर के लिए दुखी करने वाला कष्ट न दीजिये। आखिर उसने आपको जन्म दिया है और कहा भी गया है कि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान होती है। उसके ऋण से कोई भी उऋण नहीं हो सकता।

Monday, March 16, 2009

आज का युवा दिग्भ्रमित क्यों है?

आज का युवा दिग्भ्रमित क्यों है?

आज के समय यदि सबसे गम्भीर समस्या कहीं देखने को मिल रही है तो वह है युवाओं में फैलती दिग्भ्रम की स्थिति। दिग्भ्रम शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है दिक् और भ्रम जिसका शाब्दिक अर्थ होगा दिशा के विषय में भ्रम। यह शब्द उस स्थिति का द्योतक होता है जब हम किसी मोड़ पर खड़े होते हैं और हमें अनेक विकल्पों में से किसी एक विकल्प का चुनाव करना होता है। यहां जो सबसे ध्यान देने वाली बात है वह यह है कि यह स्थिति तभी उत्पन्न होती है जबकि हमारे पास एक ही कार्य को करने के लिए अनेक विकल्प उपस्थित हों। अब आप कहेंगे कि क्या पहले युवा ही नहीं होते थे या उनके सम्मुख समस्याएं ही नहीं होती थीं या वे किसी और मिट+टी के बने होते थे। इसका जवाब हो सकता है कि पहले के समय में युवाओं के सम्मुख इतने विकल्प नहीं होते थे जितने आज के समय में उपलब्ध हैं। विकल्प होना बहुत अच्छी बात है लेकिन तभी जब उसके बारे में अच्छी जानकारी भी उपलब्ध हो। आज के समय में हमारे अभिभावकों के पास सम्पन्नता आ गयी है लेकिन दुर्भाग्यवश उनके पास समयाभाव हो गया है। यही स्थिति हमारे गुरूजनों के साथ भी देखने को मिलती है। कृपया अन्यथा न लें किन्तु सत्य तो यही है कि हमारे अधिकांश गुरूजनों के पास कोचिंग और अन्य संस्थानों में पढ़ाने के लिए पर्याप्त समय है किन्तु उनका लक्ष्य केवल कोर्स समाप्त कराना ही रह गया है। हम गुरूजनों या अभिभावकों को दोष क्यों दें। यदि युवा अपने अन्दर झांक कर देखे तो उसे दिखाई देगा कि उसके अन्दर अब वह लगन भी नहीं रह गयी है अध्ययन के प्रति। हम स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि युवा अध्ययन को डिग्री प्राप्त करना समझने लगा है। परीक्षाओं को देखने से तो यही प्रतीत होता है कि पहले जहां युवा पूरी पुस्तक पढ डालता था वहीं आज वह केवल सीरीज में से केवल कुछ प्रश्न पढ़ने में ही रूचि रखता है। ऐसे में वह कैसे ज्ञान की देवी सरस्वती का कृपा पात्र बन सकता है? .........

Saturday, March 14, 2009

किस विषय पर लिखूं?

किस विषय पर लिखूं?
अपने निश्चय के मुताबित आज मैं अवश्य कुछ न कुछ लिखूंगा। लेकिन क्या लिखूंगा? फिर वही ईश्वर की दी हुई शक्ति ने उत्तर दिया विचार करो और अपने विचारों को लिखो। विचार करूं और अपने विचारों को लिखूं? लेकिन प्रश्न वहीं का वहीं रहा कि किस विषय पर विचार करूं? फिर उत्तर आया कि इसी विषय पर लिखो कि "किस विषय पर लिखूं"। बस फिर क्या था मन का घोड़ा दौड़ने लगा। कभी विचार आया कि होली का पर्व है होली पर लिखा जाय, जैसे ही यह विचार आया वैसे ही तुरन्त एक दूसरा विचार आया कि होली तो बीत गयी किसी सम-सामयिक विषय पर लिखा जाय। मन कभी इस ओर तो कभी उस ओर भाग रहा था और ठीक इसी वक्त पुन: विचार की शक्ति ने आवाज लगाई -"क्या हुआ अपनी मर्जी के विषय पर लिखने को बोला तो उस पर भी मन एकाग्रचित्त नहीं कर पा रहे हो?" यह सुनते ही मेरे दिमाग की बत्ती जली और यह ज्ञान हुआ कि यही तो योग है। मन की शक्तियों को एकाग्रचित्त करना। अरे वाह, यदि मैं नियमित ब्लागरी करूं तो योगी बन जाउंगा। अब समझ में आया कि हमारे मनीषी गुफाओं में बैठकर शायद यही अभ्यास करते थे कि मन को एकाग्रचित्त कैसे किया जाय। बिना मन को एकाग्रचित्त किये सार्थकतापूर्वक एक लाइन भी लिखना सम्भव नहीं है। हमारे पास विषयों की भरमार है हम जिस विषय पर चाहें लिख सकते हैं किन्तु हमारे मन में विचार आता है कि जो ज्यादा से ज्यादा लुभावना विषय हो उसी पर हम लिखें। इस बारे में मेरे मन में स्वामी विवेकानन्द जी से जुड़ा एक प्रसंग याद आता है जब उनके एक गुरूभाई ने ध्यान में पास स्थित कारखाने के भोंपू के शोर के कारण आ रही व्याधा का जिक्र किया तो स्वामी जी ने कहा कि क्यों नहीं तुम उस भोंपू के शोर पर ही ध्यान केन्द्रित करते? फिर क्या था वह शोर ही असीम शान्ति की अनुभूति प्रदान करने लगा। सचमुच ब्लागरी हमारे लिए एक वरदान साबित हो सकता है यदि हम इसका समुचित उपयोग अपने ध्यान और विचारों को केन्द्रित करने में कर सकें।

Tuesday, March 10, 2009

हम कहां जा रहे हैं?

हम कहां जा रहे हैं?
मेरे मित्र पवन तिवारी जी ने कल एक बड़ा ही जटिल सा प्रश्न मेरे सामने रखा। हिमांशु जी क्या कभी आपने अपने जीवन के बारे में सोचा है कि आपके जीवन का उद्देश्य क्या है, आपको कहां जाना है, जीवन का सही अर्थ क्या है? क्या आपने अपने जीवन का लक्ष्य तय कर लिया है? यदि यह प्रश्न पवन जी के अलावा किसी और ने किया होता तो मैं जीवन की एक बड़ी ही रोचक सी परिभाषा दे देता, किन्तु एक अभिन्न मित्र से मिथ्यावर्णन कैसे कर सकता था। अत: मैं चुप ही रहा। उन्होने मेरी चुप्पी से भांप लिया कि मेरी मन:स्थिति कुछ उत्तर देन की नहीं है। उन्होंने कहा कि वास्तव में यह एक कठिन प्रश्न है। हम अपने बारे में बहुत कम सोचते हैं इतिहास तो पूरा पढ़ डालते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि हमारा उद्गम और अन्त क्या है या क्या होना चाहिए। सचमुच में यह सत्य ही था और बड़ा ही जटिल प्रश्न था मेरे लिए। तब से मैं सोच रहा हूं कि सचमुच में मेरा लक्ष्य क्या है? केवल एक अच्छी नौकरी, रूपया पैसा, रूतबा या इससे हटकर कुछ और...........

Saturday, March 7, 2009

हर चौराहे पर लाश

हर चौराहे पर लाश

यह मैं क्या देख रहा हूं? हर चौराहे पर लाश! चौंक गये, लेकिन यह सत्य है। जैसे जैसे होली नजदीक आ रही है हमें हर चौराहे पर हरे-भरे फलदार वृक्षों की लाश का ढेर दिखाई दे रहा है। ये वही वृक्ष हैं जिन्होंने हमें आजीवन प्राणवायु, फल, फूल और जीवनोपयोगी अन्य सामान दिये हैं। होली तो बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है फिर भारत में ये क्या हो रहा है। यह अत्यन्त निराशाजनक है कि हम बिना विचार किये ऐसा जघन्य पाप कर रहे है। कहीं ऐसा तो नहीं कि वृक्षों और खासकर हरे-भरे वृक्षों की कटाई कर हम अच्छाई पर बुराई की विजय का संदेश फैला रहे हैं। आज के समय जिस तरह नगरीकरण बढ़ रहा है और बड़े बड़े कंक्रीट जंगल तेजी से पनप रहे हैं ऐसे में शहरों में वृक्षों की संख्या पहले ही बहुत कम रह गयी है और ऐसे में यदि यही परम्परा चलती रही तो वह दिन दूर नहीं जबकि हमारे वृक्ष खत्म हो जायेंगे और हमारे पास जमीन भी नहीं बचेगी कि हम नये वृक्ष लगा सकें। हमें इस बारे में विचार करना होगा और ऐसी परम्परा विकसित करनी होगी जो कि प्रतिवर्ष हरे-भरे वृक्षों को होली का निशाना बनने से बचा सकें।

Friday, March 6, 2009

‌मेरे पास क्या है कुछ भी तॊ नहीं दिया ऊपर वाले ने

‌मेरे पास क्या है ? कुछ भी तॊ नहीं दिया ऊपर वाले ने।
अक्सर ऎसे ही विचार हमारे मन में न जाने कहां से आते रहते हैं। जब ये विचार हमारे मन में आते रहते हैं उसी समय इन विचारॊ के सहारे ऊपर वाला हमें संदेश देता है कि मैंने तुम्हें क्या दिया है। ये जॊ तुमने सॊचा,‌ यह जॊ विचार की शक्ति है यही तुम्हारी सबसे बडी ताकत है यही सबसे बडा हथियार है जॊ मैने तुमकॊ दिया है। अरे वाह इस ऒर तॊ कभी हमारा ध्यान ही नहीं गया। सचमुच यह तॊ बडे काम की चीज है। अरे आज तक न जाने मैंने कितने विचारॊं पर बिना विचार किये ही उन्हें व्यर्थ में गवा दिया। विचार की मशीन बिना रुके बिना थके दिन रात चलती रहती है। हर समय हमारे मन में तरह तरह के विचार पनपते रहते हैं। पर क्या कभी हमने इन मुफ्त में मिले विचारॊं पर गौर किया। नहीं न। फिर हमने कैसे ऊपर वाले पर दॊष लगाना शुरू कर दिया।
विचार की शक्ति बहुत बडी शक्ति है। यह हमें निरन्तर न जाने कहां से मिलती रहती है। हम कभी इस ऒर ध्यान भी नहीं देते। आवश्यकता इस बात की है कि हम इस पर विचार करें और अपने विचारॊ कॊ सहेजना सीखें। यही प्रयास करने की शुरूआत मैने आज इस पॊस्ट के माध्यम से किया है। यह मेरा छॊटा सा ही कदम है लेकिन मुझे विश्वास है कि हर लम्बे सफर का पहला कदम छॊटा ही हॊता है। अतः मेरा यह छॊटा कदम व्यर्थ नही जायेगा और मैं निरन्तर अपने विचारॊं कॊ सहेजता रहूंगा।
जरा विचार कीजिए यदि हमारे पूर्वजॊं ने विचारॊं कॊ सहेजा न हॊता तॊ क्या हम वहां हॊते जहां आज हैं। बिल्कुल नहीं। ठीक है मैं आज से ही अपने विचारॊं कॊ सहेजना शुरू कर देता हूं। मुझे पूरा विश्वास है कि ईश्वर इस कार्य में मेरी मदद अवश्य करेगा।