Friday, November 17, 2017

हृदय परिवर्तन

    एक राजा को राज भोगते हुए काफी समय हो गया था। बाल भी सफ़ेद होने लगे थे। एक दिन उसने अपने दरबार में एक उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया। उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया।
    राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि यदि वे चाहें तो नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें। सारी रात नृत्य चलता रहा। ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी। नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा -
      बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताय।
   एक पलक के कारने, क्यों कलंक लग जाय।
   अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अलग-अलग अर्थ निकाला। तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा।
   जब यह बात गुरु जी ने सुनी तो  उन्होंने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फैंक दीं।
   वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार नर्तकी को भेंट कर दिया।
   उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के पुत्र युवराज ने अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया।
   नर्तकी फिर वही दोहा दोहराने लगी तो राजा ने कहा - "बस कर, एक दोहे से तुमने वैश्या होकर भी सबको लूट लिया है।"
   जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरु जी कहने लगे - "राजा! इसको तू वैश्या मत कह, ये तो अब मेरी गुरु बन गयी है। इसने मेरी आँखें खोल दी हैं। यह कह रही है कि मैं सारी उम्र संयमपूर्वक भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ, भाई! मैं तो चला।" यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े।
   राजा की लड़की ने कहा - "पिता जी! मैं जवान हो गयी हूँ। आप आँखें बन्द किए बैठे हैं, मेरी शादी नहीं कर रहे थे और आज रात मैं आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेने वाली थी। लेकिन इस नर्तकी ने मुझे सुमति दी है कि जल्दबाजी मत कर कभी तो तेरी शादी होगी ही। क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है?"
   युवराज ने कहा - "पिता जी! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे। मैंने आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपका कत्ल करवा देने का विचार कर लिया था। लेकिन इस नर्तकी ने समझाया कि पगले! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है। धैर्य रख।"
   जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म-ज्ञान हो गया। राजा के मन में वैराग्य आ गया। राजा ने तुरन्त फैसला लिया - "क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ।" फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा - "पुत्री! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं। तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रूप में चुन सकती हो।" राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया।
   यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा - "मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी?" उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया। उसने उसी समय निर्णय लिया कि आज से मैं अपना बुरा धंधा बन्द करती हूँ और कहा कि "हे प्रभु! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना। बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करुँगी।"
   समझ आने की बात है, दुनिया बदलते देर नहीं लगती। एक दोहे की दो लाईनों से भी हृदय परिवर्तन हो सकता है। बस, केवल थोड़ा धैर्य रखकर चिन्तन करने की आवश्यकता है।

Sunday, November 12, 2017

तुम्हारे विचार ही तुम्हारे कर्म हैं

बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। एक शिष्य ने पूछा- "कर्म क्या है?"
बुद्ध ने कहा- "मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।"

एक राजा हाथी पर बैठकर अपने राज्य का भ्रमण कर रहा था।अचानक वह एक दुकान के सामने रुका और अपने मंत्री से कहा- "मुझे नहीं पता क्यों, पर मैं इस दुकान के स्वामी को फाँसी देना चाहता हूँ।" यह सुनकर मंत्री को बहुत दु:ख हुआ। लेकिन जब तक वह राजा से कोई कारण पूछता, तब तक राजा आगे बढ़ गया।

अगले दिन, मंत्री उस दुकानदार से मिलने के लिए एक साधारण नागरिक के वेष में उसकी दुकान पर पहुँचा। उसने दुकानदार से ऐसे ही पूछ लिया कि उसका व्यापार कैसा चल रहा है? दुकानदार चंदन की लकड़ी बेचता था। उसने बहुत दुखी होकर बताया कि मुश्किल से ही उसे कोई ग्राहक मिलता है। लोग उसकी दुकान पर आते हैं, चंदन को सूँघते हैं और चले जाते हैं। वे चंदन कि गुणवत्ता की प्रशंसा भी करते हैं, पर ख़रीदते कुछ नहीं। अब उसकी आशा केवल इस बात पर टिकी है कि राजा जल्दी ही मर जाएगा। उसकी अन्त्येष्टि के लिए बड़ी मात्रा में चंदन की लकड़ी खरीदी जाएगी। वह आसपास अकेला चंदन की लकड़ी का दुकानदार था, इसलिए उसे पक्का विश्वास था कि राजा के मरने पर उसके दिन बदलेंगे।

अब मंत्री की समझ में आ गया कि राजा उसकी दुकान के सामने क्यों रुका था और क्यों दुकानदार को मार डालने की इच्छा व्यक्त की थी। शायद दुकानदार के नकारात्मक विचारों की तरंगों ने राजा पर वैसा प्रभाव डाला था, जिसने उसके बदले में दुकानदार के प्रति अपने अन्दर उसी तरह के नकारात्मक विचारों का अनुभव किया था।

बुद्धिमान मंत्री ने इस विषय पर कुछ क्षण तक विचार किया। फिर उसने अपनी पहचान और पिछले दिन की घटना बताये बिना कुछ चन्दन की लकड़ी ख़रीदने की इच्छा व्यक्त की। दुकानदार बहुत खुश हुआ। उसने चंदन को अच्छी तरह कागज में लपेटकर मंत्री को दे दिया।

जब मंत्री महल में लौटा तो वह सीधा दरबार में गया जहाँ राजा बैठा हुआ था और सूचना दी कि चंदन की लकड़ी के दुकानदार ने उसे एक भेंट भेजी है। राजा को आश्चर्य हुआ। जब उसने बंडल को खोला तो उसमें सुनहरे रंग के श्रेष्ठ चंदन की लकड़ी और उसकी सुगंध को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। प्रसन्न होकर उसने चंदन के व्यापारी के लिए कुछ सोने के सिक्के भिजवा दिये। राजा को यह सोचकर अपने हृदय में बहुत खेद हुआ कि उसे दुकानदार को मारने का अवांछित विचार आया था।

जब दुकानदार को राजा से सोने के सिक्के प्राप्त हुए, तो वह भी आश्चर्यचकित हो गया। वह राजा के गुण गाने लगा जिसने सोने के सिक्के भेजकर उसे ग़रीबी के अभिशाप से बचा लिया था। कुछ समय बाद उसे अपने उन कलुषित विचारों की याद आयी जो वह राजा के प्रति सोचा करता था। उसे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ऐसे नकारात्मक विचार करने पर बहुत पश्चात्ताप हुआ।

यदि हम दूसरे व्यक्तियों के प्रति अच्छे और दयालु विचार रखेंगे, तो वे सकारात्मक विचार हमारे पास अनुकूल रूप में ही लौटेंगे। लेकिन यदि हम बुरे विचारों को पालेंगे, तो वे विचार हमारे पास उसी रूप में लौटेंगे।

यह कहानी सुनाकर बुद्ध ने पूछा- "कर्म क्या है?" अनेक शिष्यों ने उत्तर दिया- "हमारे शब्द, हमारे कार्य, हमारी भावनायें, हमारी गतिविधियाँ..."

बुद्ध ने सिर हिलाया और कहा- "तुम्हारे विचार ही तुम्हारे कर्म हैं।"

Sunday, October 29, 2017

Old Man and Tree || बूढा आदमी और पेड

    एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था। जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड के पास पहुच जाता। पेड के उपर चढ़ता,आम खाता,खेलता और थक जाने पर उसी की छाया मे सो जाता। उस बच्चे और आम के पेड के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया। बच्चा जैसे-जैसे बडा होता गया वैसे-वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया। कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया। आम का पेड उस बालक को याद करके अकेला रोता।
    एक दिन अचानक पेड ने उस बच्चे को अपनी तरफ आते देखा और पास आने पर कहा, "तू कहां चला गया था? मै रोज तुम्हे याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनो खेलते है।" बच्चे ने आम के पेड से कहा, "अब मेरी खेलने की उम्र नही है। मुझे पढना है,लेकिन मेरे पास फीस भरने के पैसे नही है।" पेड ने कहा, "तू मेरे आम लेकर बाजार मे बेच दे, इससे जो पैसे मिले अपनी फीस भर देना।" उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया। उसके बाद फिर कभी दिखाई नही दिया।आम का पेड उसकी राह देखता रहता।
    एक दिन वो फिर आया और कहने लगा, "अब मुझे नौकरी मिल गई है, मेरी शादी हो चुकी है, मुझे मेरा अपना घर बनाना है,इसके लिए मेरे पास अब पैसे नही है।" आम के पेड ने कहा, "तू मेरी सभी डाली को काट कर ले जा,उससे अपना घर बना ले।" उस जवान ने पेड की सभी डाली काट ली और ले के चला गया।
    आम के पेड के पास अब कुछ नहीं था वो अब बिल्कुल बंजर हो गया था। कोई उसे देखता भी नहीं था। पेड ने भी अब वो बालक/जवान उसके पास फिर आयेगा यह उम्मीद छोड दी थी। फिर एक दिन अचानक वहाँ एक बुढा आदमी आया। उसने आम के पेड से कहा, "शायद आपने मुझे नही पहचाना, मैं वही बालक हूं जो बार-बार आपके पास आता और आप हमेशा अपने टुकड़े काटकर भी मेरी मदद करते थे।" आम के पेड ने दु:ख के साथ कहा, "पर बेटा मेरे पास अब ऐसा कुछ भी नही जो मै तुम्हे दे सकूँ।" वृद्ध ने आंखो मे आंसु लिए कहा, "आज मै आपसे कुछ लेने नही आया हूं बल्कि आज तो मुझे आपके साथ जी भरके खेलना है, आपकी गोद मे सर रखकर सो जाना है।" इतना कहकर वो आम के पेड से लिपट गया और आम के पेड की सुखी हुई डाली फिर से अंकुरित हो उठी।

वो आम का पेड़ कोई और नही हमारे माता-पिता हैं दोस्तों। जब छोटे थे उनके साथ खेलना अच्छा लगता था। जैसे-जैसे बडे होते चले गये जिम्‍मेदारियों के मायाजाल में जकडकर उनसे दूर होते गये। पास भी तब आये जब कोई जरूरत पडी, कोई समस्या खडी हुई। आज कई माँ बाप उस बंजर पेड की तरह अपने बच्चों की राह देख रहे है। जाकर उनसे लिपटे, उनके गले लग जाये। उनकी जी भर सेवा करें। फिर देखना वृद्धावस्था में उनका जीवन फिर से अंकुरित हो उठेगा।

Friday, October 27, 2017

राजा और चिड़िया || Raja Aur Chidiya || The Kind and the Bird

    राजा के विशाल महल में एक सुंदर वाटिका थी, जिसमें अंगूरों की एक बेल लगी थी। वहां रोज एक चिड़िया आती और मीठे अंगूर चुन-चुनकर खा जाती मगर अधपके और खट्टे अंगूरों को नीचे गिरा देती। माली ने चिड़िया को पकड़ने की बहुत कोशिश की पर वह हाथ नहीं आई। हताश होकर एक दिन माली ने राजा को यह बात बताई। यह सुनकर भानुप्रताप को आश्चर्य हुआ। उसने चिड़िया को सबक सिखाने की ठान ली। एक दिन वह वाटिका में छिपकर बैठ गया। जब चिड़िया अंगूर खाने आई तो राजा ने फुर्ती से उसे पकड़ लिया।
    जब राजा चिड़िया को मारने लगा, तो चिड़िया ने कहा, 'हे राजन, मुझे मत मारो। मैं आपको ज्ञान की 4 महत्वपूर्ण बातें बताऊंगी।' राजा ने कहा, 'जल्दी बता।' चिड़िया बोली, 'हे राजन, सबसे पहले तो हाथ में आए शत्रु को कभी मत छोड़ो।' राजा ने कहा, 'दूसरी बात बता।' चिड़िया ने कहा, 'असंभव बात पर भूलकर भी विश्वास मत करो और तीसरी बात यह है कि बीती बातों पर कभी पश्चाताप मत करो'
    राजा ने कहा, 'अब चौथी बात भी जल्दी बता दो।' इस पर चिड़िया बोली, 'चौथी बात बड़ी गूढ़ और रहस्यमयी है। मुझे जरा ढीला छोड़ दें क्योंकि मेरा दम घुट रहा है। कुछ सांस लेकर ही बता सकूंगी।' चिड़िया की बात सुन जैसे ही राजा ने अपना हाथ ढीला किया, चिड़िया उड़कर एक डाल पर बैठ गई और बोली, 'मेरे पेट में दो हीरे हैं'
    यह सुनकर राजा पश्चाताप में डूब गया। राजा की हालत देख चिड़िया बोली, 'हे राजन, ज्ञान की बात सुनने और पढ़ने से कुछ लाभ नहीं होता, उस पर अमल करने से होता है। आपने मेरी बात नहीं मानी। मैं आपकी शत्रु थी, फिर भी आपने पकड़कर मुझे छोड़ दिया। मैंने यह असंभव बात कही कि मेरे पेट में दो हीरे हैं फिर भी आपने उस पर भरोसा कर लिया। आपके हाथ में वे काल्पनिक हीरे नहीं आए तो आप पछताने लगे।

उपदेशों को जीवन में उतारे बगैर उनका कोई मोल नहीं।  

Tuesday, September 26, 2017

दृष्‍टान्‍त - एक साधु की कथा

एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था कि अपनी ही धुन में रहने वाले इस साधु ने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबाला जा रहा था, तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबियां तैयार हो रही थी। साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया। शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था, साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा साधु कुछ खाना चाहता था। अपनी मस्ती के बीच इस भूख को जान वह प्रभु को स्मरण कर मन ही मन कहा कि क्या क्या लीला करते होक्योंकि साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते.... साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ  सेंकने के बाद चला ही जाना चाहता था कि नेक दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दें दी। अपनी धुन का मस्त वो साधु प्रभु की मर्जी समझ गरम जलेबियां गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिऐ प्रार्थना की, फिर आगे चल दिया। 

साधु बाबा का पेट भर चुका था दुनिया के दु:खों से बेपरवाह वे फिर इक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था। वह इस बात से बेखबर था कि एक युवा नव विवाहिता जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता बचाता उसके पीछे चला आ रहें है। एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी..... बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये। उसके युवा पति से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई, इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु के कपड़ो से पकड़ कर कहने लगा अंधा है...... तुमको नज़र नहीं आता तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गऐ हैं और कीचड़ से भर गऐ हैं.....। 

साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था, जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाखुशगवार गुजर रहा था।महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से साधु को छुड़ाना भी चाहा, लेकिन युवा की आंखों से निकलती नफरत की चिंगारी देख वह भी फिर पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई। राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने एक जोरदार थप्पड़ साधु के चेहरे पर जड़ दिया बूढ़ा साधु थप्पड़ की मार से लड़खड़ाता हुऐ कीचड़ में जा पड़ा। युवक ने जब साधु को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दिया। बूढे साधु ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला वाह मेरे भगवान कभी गरम दूध जलेबियां और कभी गरम थप्पड़.... लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है। यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया।

दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती को समर्पित अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया। थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुक गए। वह अपने घर पहुंच गए थे, वे युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी मजाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियों तय कर रहा था। बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा। महिला ने बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी जिसकी वजह से काफी लोग तुरंत सहायता के लिये युवा की ओर लपके..... लेकिन देर हो चुकी थी युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर मे ज्यादा खून बह जाने के कारण इस नौजवान युवक की मौत हो चुकी थी। 

कुछ लोगों ने दूर से आते साधु बाबा को देखा तो आपस में कानाफुसी होने लगीं कि निश्चित रूप से इस साधु बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को श्राप दिया है, अन्यथा ऐसे नौजवान युवक का केवल सीढ़ियों से गिर कर मर जाना बड़े अचम्भे की बात लगती है। कुछ मनचले युवकों ने यह बात सुनकर साधु बाबा को घेर लिया एक युवा कहने लगा - 'आप कैसे भगवान के भक्त हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को श्राप दे बैठे। भगवान के भक्त मे रोष व गुस्‍सा हरगिज़ नहीं होता। आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सकें।' साधु बाबा कहने लगा भगवान की क़सम मैंने इस युवा को श्राप नहीं दिया। अगर आप ने श्राप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से गिरकर कैसे मर गया

तब साधु बाबा ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि आप में से कोई इस सब घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद हैएक युवक ने आगे बढ़कर कहा, 'हाँ मैं इस सब घटना का चश्मदीद गवाह हूँ ।' साधु ने अगला सवाल किया- 'मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़े को दागी किया था?' युवा बोला- 'नहीं...!! लेकिन महिला के कपड़े जरूर खराब हुए थे' उस मस्ताने साधु ने युवक की बाँहों को थामते हुए पूछा, ' फिर युवक ने मुझे क्यों मारा?' युवा कहने लगा-' क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे..... इसलिए उस युवक ने आपको मारा....' 

युवा की बात सुनकर साधु बाबा ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया, 'तो भगवान की क़सम मैंने श्राप कभी किसी को नहीं दिया लेकिन कोई है जो मुझ से प्रेम रखता है। अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझे मारे और वह इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है।मेरा यार.. , मेरा प्यार... , वो परमात्मा ही है। उस परमात्मा की लाठी दीख़ती नही और आवाज भी नही करती लेकिन पडती हैं तों बहुत दर्द देती है।'


हमारे कर्म ही हमें उसकी लाठी से बचातें हैं बस कर्म अच्छे होने चाहिये...

Sunday, January 26, 2014

पीए साहब || PA Sahab


पात्र परिचय
पीए साहब        एक बत्तीस वर्ष का नौजवान, पढ़ा-लिखा, ऊर्जावान, अच्छी कद-काठी का जवान।
बड़े बाबू         एक सरकारी कार्यालय के कार्यालय अधीक्षक, उम्र लगभग 55 वर्ष। दुबला-पतला शरीर, चेहरे एवं पहनावे से शालीन।
रामधनी        सरकारी कार्यालय का चपरासी। उम्र लगभग 50 से 55 वर्ष के बीच। कुर्ता-पाजामा पहने हुए और कन्धे पर एक गमछा रखे हुए। शरीर दुबला पतला है। चेहरे पर चमक है। शान्त स्वभाव का सीध-साधा कर्मचारी। 
मिश्राजी, शर्माजी, जावेद, अच्छेलाल - उसी सरकारी कार्यालय के अन्य कर्मचारीगण, पहनावा सामान्य।

प्रथम दृश्य
सब कुछ रोज जैसा ही चल रहा है। रामधनी ने आकर कार्यालय का दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही सफाईकर्मी अपने अपने काम में लग गये। रामधनी ने एक कुशल पर्यवेक्षक की तरह कार्यालय के कोने कोने की सफाई करवाई। जब रामधनी कार्यालय की सफाई से आश्वस्त हो गया तब उसने साहब की मेज को व्यवस्थित किया, बगिया से दौड़कर फूल लाया और गुलदस्ता सजाया। गिलास को कई बार धुल-चमकाकर साहब के लिए पीने का पानी रखा। रामधनी इस कार्यालय का सबसे पुराना चपरासी है। यह सब कार्य उसकी दैनिक दिनचर्या का अंग हैं। वह बिना चूके प्रतिदिन एक मुस्तैद सिपाही की तरह सारे कार्यों को अन्जाम देता है।

साहब के कमरे से ही लगा हुआ एक छोटा सा कमरा साहब के वैयक्तिक सहायक का है। कार्यालय में सब उन्हें पीए साहब कहते हैं। साहब-सूबा तो रौबदार होते ही हैं पीए साहब उनसे भी अधिक रौबदार हैं। साहब के कमरे की साफ-सफाई के बाद रामधनी ने उसी लगन एवं मुस्तैदी के साथ पीए साहब का कमरा व्यवस्थित किया और फिर वहीं बैठकर साहब के आने की प्रतीक्षा करने लगा।

(पीए साहब का प्रवेश। शक्ल-सूरत एवं पहनावे से अफसर सरीखे। चाल-ढाल भी अफसरों जैसी। एक पढ़े-लिखे व्यक्ति की छवि। दिमाग में पता नहीं क्या उधेड़-बुन चल रही है। लग रहा है पूरे देश की जिम्मेदारी इन्हीं के कन्धों पर जबरन लाद दी गयी हो।)

पीए (बुदबुदाते हुए)-   कैसे कामचोरों से पाला पड़ा है। एक काम भी ठीक से नहीं कर सकते। (चिल्लाते हुए) रामधनी .... रामधनी .......
रामधनी - जी साहब
पीए - ये क्या रामधनी। तुमको एक बारे में कोई चीज समझ में नहीं आती? ये फाइल फिर यहां कैसे आ गयी?
रामधनी (धीरे से)- जी.... बड़े साहब आपय के देय के कहे रहे ...।
पीए - (गुस्से से चिल्लाते हुए) - देय के कहे रहे। .... अरे देय के कहे रहे तो क्या तू मेरे सिर पर रख देगा? ...  उधर रख आलमारी में। (बुदबुदाते हुए) किसी से प्यार से बोल क्या दो सिर पर चढ़ जाते हैं। आपय के देय के कहे रहे ...
रामधनी (चुटकी लेते हुए) - साहेब आज घर से झगड़ा कइ के आये हैं का? बड़े गुस्सा मा हैं?
पीए - फालतू बकवास बन्द। जा के एक कप चाय बना के ला। और हां .... शक्कर थोड़ी ज्यादा डालना। ... (सिर पर हाथ फेरते हुए, खुद से ही ) ... सिर दर्द से फटा जा रहा है।
(रामधनी चाय बनाने के लिए जैसे ही कमरे से बाहर निकलता है, दरवाजे पर खड़े बड़े बाबूजी से टकराते-टकराते बचता है।)
रामधनी - राम राम बाबू जी।
बड़े बाबू- राम राम। ... और रामधनी ... सुबह सुबह कहां दौड़ लगा दी?
रामधनी - कुछ नहीं बाबू जी। पीए साहेब की खातिर चाय बनावे जा रहे हैं। (धीरे से) आजकल न जाने का होइ गवा है सीधे मुह बातय नहीं करते।
(बड़े बाबू और रामधनी की उम्र में ज्यादा अन्तर न था। दोनों के पचास बसन्त पूरे हो चुके थे। इस कार्यालय में दोनों ने साथ साथ बीस-बाईस बरस तक अच्छे-बुरे दिन साथ-साथ बिताये। कभी एक-दूसरे को शिकायत का मौका नहीं मिला। कभी किसी बात पर कुछ कहा सुनी हो भी गयी तो फिर कुछ ही देर में सब कुछ कहा-सुना माफ, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उम्र के इस दौर में यदि व्यक्ति को अनावश्यक डांट-फटकार मिले तो उसका हृदय दुखी होना स्वाभाविक था।)
रामधनी (दुखी मन से) - आप तो सब जानिथ है बड़े बाबू। एतनी उमिर बीत गई। कभौ सिकाइत के मौका नहीं दिहा। ना जाने काहे आजकल पीए साहेब हमसे गुस्सा हैं। ई उमिर में ई सब बर्दास नहीं होय बाबू जी। बाबूजी हमार ड्यूटी कहूं अउर लगवाय दें। कउनव दिन हमरे मुहे से कुछ निकल गवा ....
बड़े बाबू - (बड़े बाबू ने आश्वस्त करने वाली मुस्कान के साथ रामधनी की ओर देखा और रामधनी के कंधे पर हाथ रखकर ढाढस बंधाते हुए बोले) मैं बात करता हूं। .... तुम जाओ अपना काम करो ...
(बड़े बाबू ने रामधनी को आश्वासन तो दे दिया, लेकिन वे खुद भी बड़े असमंजस में हैं कि वे पीए से कहें भी तो क्या कहें। इन दिनों कई मसलों पर उनकी खुद की पीए से कहासुनी हो चुकी है। लेकिन बड़े बाबू होने के नाते, कार्यालय का मुखिया होने के नाते ये उनका कर्तव्य है कि वे कार्यालय के अन्दर काम करने का एक अच्छा वातावरण बना कर रखें। उन्होंने हिम्मत बटोरी और चल पड़े पीए के पास)
बड़े बाबू (सौम्य मुस्कान से साथ) - क्या पीए साहब! बड़ा हो-हल्ला मचा रखा है।
पीए - ये सब आपके कारण ही हो रहा है। कार्यालय की कोई मर्यादा ही नहीं है। टके-टके के आदमी काम कम करते हैं और जुबान ज्यादा चलाते हैं। मेरे साथ ये सब न चलेगा। आप ही इन्हें अपने सिर पर बिठा कर रखिये। 
(पीए साहब और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाते रहे। बड़े बाबू अपना सा मुंह लेकर उल्टे पांव वापस आ गये। बड़े बाबू को मन में मलाल था कि वे आखिर क्यों गये पीए के पास। उम्र में बड़े बाबू पीए के पिता के समान हैं। उनका स्वभाव इतना सीधा और सरल था कि आज तक उनपर कोई उंगली तक न उठा सका था। बड़े बाबू ने अपने चारों तरफ देखा कि किसी ने देखा या सुना तो नहीं। चलो गनीमत यही थी कि अभी कार्यालय में कोई आया नहीं था। वैसे भी सरकारी कार्यालयों में ग्यारह बजे के पहले कोई आता भी कहां है। बड़े बाबू की इज्जत इस लेट-लतीफी की वजह से बच गई। रामधनी सब सुन-देख रहा था, लेकिन बड़े बाबू को उस पर अपने से ज्यादा भरोसा था। वे जानते थे कि रामधनी ऐसी बातों का जिक्र किसी से भी नहीं करेगा। रामधनी भले ही इन बातों को जिक्र कहीं न करे लेकिन ये बातें छिपती नहीं हैं।)

द्वितीय दृश्य

आज कार्यालय में चर्चा का बाजार गर्म है। हर तरफ यही चर्चा चल रही है। सभी कुछ न कुछ बुदबुदा रहे हैं। जैसे-तैसे दोपहर हुई। लन्च का समय होते ही सभी बाबू चाय की दूकानों की तरफ चल पड़े। आज तो सबके पैरों में कुछ ज्यादा ही गति थी। सभी एक-दूसरे को पुकारते हुए कार्यालय के बाहर निकल रहे थे जैसे किसी अतिमहत्वूपर्ण मिशन पर निकल रहे हों। दूकान पर पहुंच कर।)

मिश्रा जी - आज सबकी चाय मेरी तरफ से। (दूकानदार की तरफ) गुड्डू भाई चार चाय देना और साथ में थोड़ी नमकीन भी। 
शर्मा जी - अरे चार नहीं पांच चाय देना। बड़े बाबू भी आ रहे हैं। (बड़े बाबू की तरफ) अरे बड़े बाबू जी आइये .... आइये ... इधर बैठिये ... (कुर्सी उनकी ओर सरकाते हुए)
बड़े बाबू (कुर्सी पर बैठते हुए। चेहरे पर वही सौम्य मुस्कान। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। चुटकी लेते हुए) - आज पूरा का पूरा अमला एक साथ .... क्या बात है भाई? ....
मिश्रा जी (शिकायती लहजे में) - आप तो जैसे कुछ जानते ही नहीं। ...
बड़े बाबू (स्थिर भाव से) - सही कह रहा हूं। मुझे नहीं पता। किसी का जन्मदिन है क्या आज? (प्रश्नवाचक मुद्रा में) 
जावेद - अच्छा बड़े बाबू जब आपको नहीं मालूम तो आप बैठिये और आराम से चाय पीजिए।
शर्मा जी - भाई मैं तो कहता हूं कि ऐसे आदमी के साथ अब काम करना मुश्किल है। बात-बात में गरम हो जाता है। हमारे शरीर में भी खून है। किसी दिन .....
जावेद - मुझसे तो कभी टकराया ही नहीं। नहीं तो वहीं पर दो-चार धर के आता। कोई चूड़ियां नहीं पहन रखी है। आप लोग पता नहीं कैसे बर्दाश्त करते हैं ...
अच्छेलाल - मुझे तो कोई और ही चक्कर समझ में आता है। देखते नहीं आजकल कितनी छुट्टियां लेता है। आये दिन बाहर जाता है। किसी लड़की-वड़की का ......
बड़े बाबू - अरे भाई .... ऐसी कोई बात नहीं है। मैं अच्छी तरह जानता हूं उसे। वो ऐसा लड़का नहीं है। 
मिश्रा जी - सही बात। बिना जाने समझे किसी के चरित्र पर कीचड़ नहीं उछालना चाहिए।
जावेद (मजाकिया लहजे में) - अगर किसी जिन्न या प्रेत का चक्कर हो तो मैं जानता हूं झाड़-फूंक करने वाले एक फकीर को .... बहुत पहुंचे हुए हैं ... हा हा हा ... (सभी हंसने लगते हैं)
बड़े बाबू (विचारमग्न मुद्रा में। गम्भीर स्वर में) - मुझे लगता है कि वो किसी नशे का आदी हो गया है। आज का युवा नशे का शिकार बड़ी तेजी से हो रहा है खासकर जो युवा स्वावलम्बी हैं। इसीलिए हमेशा खोया-खोया रहता है और बहकी-बहकी बातें करता है।
मिश्रा जी - बड़े बाबू .... मुझे भी यही लगता है कि वह किसी नशीली गोली का सेवन करता है। क्योंकि एक बार जब मैं उसके कमरे में गया तो वो कोई दवा खाकर पानी पी रहा था। मेरे लाख पूछने पर भी बन्दे ने न तो मर्ज बताया और न ही दवा का रैपर देखने दिया। पहले तो मैं ही उसका फैमिली वैद्य हुआ करता था। डाक्टर कुछ भी दवा लिख दे,... बन्दा मुझसे सलाह किये मजाल क्या थी कि एक भी गोली खा ले।
शर्मा जी - मुझे भी यही लगता है। देखते नहीं आजकल कैसा झुंझलाया सा रहता है। और मैंने तो यहां तक भी सुना है कि आजकल बड़े साहब से भी पटरी नहीं खा रही है।
बड़े बाबू (घड़ी देखते हुए) - अरे भाई कार्यालय नहीं चलना है क्या। जलपान का समय कब का खत्म हो गया और तुम्हारी चैपाल है कि खत्म ही नहीं होती। चलो- चलो .. (सभी उठकर कार्यालय की ओर जाते हैं। मिश्रा जी दुकानदार को पैसे देते हैं।) 

तृतीय दृश्य
पन्द्रह दिनों के बाद
आज भी कार्यालय रोज की तरह खुला, लेकिन रामधनी के चेहरे से मुस्तैदी गायब है। कार्यालय की साफ-सफाई रोज की तरह ही हुई। कार्यालय में जैसे कोई रौनक ही न हो। कार्यालय की साफ सफाई खतम हुई। धीरे-धीरे करके सभी कर्मचारी आने लगे। रोज की तरह सबसे पहले बड़े बाबू, उसके बाद मिश्राजी, शर्माजी सबसे अन्त में अच्छेलाल। सबके चेहरे पर मायूसी और प्रश्नचिह्न साफ-साफ झलक रहा था। बड़े बाबू ने बिना किसी से कोई बात किये अपनी दराज खोली और लिफाफों का एक बंडल निकाला। हर लिफाफे पर एक-एक कर्मचारी का नाम लिखा था। ये लिफाफे पीए साहब ने बड़े बाबू के पास छुट्टी जाते समय रख दिया था साथ ही निर्देश भी दिया था कि इन लिफाफों को वितरित करने का समय पीए साहब बतायेंगे। यह कौन जानता था कि पीए साहब का यह अवकाश उनका अन्तिम अवकाश है और वे कभी न खत्म होने वाले अवकाश पर चले जायेंगे। पीए साहब की असामयिक मृत्यु ने सभी को सकते में डाल दिया है। कल रात बड़े बाबू के पास पीए साहब के घर से उनकी मृत्यु की खबर आई साथ ही लिफाफे बांटने का सन्देश भी मिला। बड़े बाबू ने आज कार्यालय आकब सबसे पहले लिफाफे बांटने का ही कार्य किया। एक-एक करके सबने लिफाफे लिए। सभी लिफाफों में एक-एक खत था। सभी ने असमंजस के साथ खत खोला और पढ़ने लगे। सब अपना-अपना खत पढ़ रहे हैं और उनकी आंखों से पश्चाताप के आंसू अनायास ही बहे जा रहे हैं। किसी की हिम्मत नहीं हो रही है कि वह एक-दूसरे से आंख मिला सके या यह देख सके कि दूसरा भी रो रहा है या नहीं। बड़े बाबू ने भी अपना खत पढ़ा और खत मेज पर रखकर अपना चश्मा उतारा और आंसू पोंछे। बड़े बाबू को कुछ स्थिर देखकर.... रामधनी बड़े बाबू के पास आकर धीरे से कहता है
रामधनी - हे बड़े बाबू, तोहार गोड़ लागी ... तनी हमरव लिफफवा खाली न ....। तनी पढ़ि के सुनाई त कि हमरे पीए साहेब का लिखे हैं। हम निरक्षर आदमी ई करिया अच्छर का समझी।
बड़े बाबू (आंसू पोछकर चश्मा उठाते हैं और रामधनी से पत्र लेकर पढ़ते हैं।) - रामधनी काका, जब ये खत आपको मिलेगा तब तक मैं आपसे बहुत दूर जा चुका होउंगा। मैं जानता हूं कि मुझे ब्लड कैंसर है और बीमारी इस स्तर पर पहुंच चुकी है कि अब इसका कोई इलाज नहीं। मैं चाहता था कि मेरे जाने के बाद आप सब को दुख न हो इसलिए मैंने जानबूझ कर रूखा स्वभाव अपना लिया था। रामधनी काका आप तो मेरे पिता के समान हैं, मेरा कहा-सुना अपना बेटा मानकर भुला देना और हो सके तो मुझे माफ कर देना। 
आपका अपना
पीए साहब

Saturday, January 25, 2014

मैं भी लिख सकता हूं कविता


फिर आया है याद मुझे कि
मैं भी लिख सकता हूं कविता।
नभ-जल-थल-आकाश विषय पर,
जीवन के एहसास, समय पर
भूली बिसरी यादों पर
पूस-माघ और भादों पर
जीवन में जो घटता-बचता
मैं भी लिख सकता हूं कविता।

जीना-मरना, जस-अपजस पर
यति-गत, नीरस और सरस पर
हर्ष-विषाद, सबल-निर्बल पर
हार-जीत और ठोस-तरल पर
शब्द-विलोम से रच दी कविता
मैं भी लिख सकता हूं कविता।

पक्षी-विहग-शकुनि-नभचर पर
दैत्य-दनुज-राक्षस-निशिचर पर
भानु-भास्कर-रवि-दिनकर पर
भंवरा-मधुप-भ्रमर-मधुकर पर
सम-अर्थी शब्दों की कविता
मैं भी लिख सकता हूं कविता।

नृत्य-नाच और अक्षि-आंख पर
पंच-पांच और लक्ष-लाख पर
चन्द्र-चांद और दंत-दांत पर
कर्म-काम और सप्त-सात पर
तत्सम-तद्भव की यह कविता
मैं भी लिख सकता हूं कविता।